Thursday, June 30, 2011

गुफ्तगू

A Poem that i wrote sometime back:


दिमाग की दिल से जब-जब हुई गुफ्तगू,

शातिर ने उपजाई तहरीरें, बाटने की रूह.

हमेशा ही कहा सब्र करो, वक़्त ने अभी आना है,

हवा का रुख समझो, न किसी का ठौर, न ठिकाना है.


कमज़ोर, गर दिल होता, रुक जाता इस फ़साने मे,

उसको वक़्त का न इल्म था, उन लम्हों के पैमाने मे.

वोह निगाहें मिलाकर, पीता गया और जीता गया,

जेहन का वजूद, सिमटा, बीता और फिर ग़ुम हो गया.


चुप्पी थी, सन्नाटा नहीं,

सफ़ेद, सुगन्धित शान्ति, एक अंगड़ाई,

हम जले, मै था ही नहीं,

पानी की बूँदें, गिर-गिर, मुस्कुराईं.


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